سورسخن رسالهٔ کوچکی است که الگویی از دعای سپاس بر سر سفره میهمانی را به دست میدهد و در آن آداب سپاس گزاری از اورمزد و امشاسپندان و ایزدان گوناگون و میزبان و نیز دعا و ثنا به بزرگان از شاه گرفته تا ولیعهد، وزیر بزرگ، اسپهبدان نواحی چهارگانه، رئیس داوران کشور، اندرزبد (مشاور) مغان و هزاربد آمده است. پس از آن، دعا برای کشور ایران و میزبان و سرانجام سپاسگزاری از اورمزد و امشاسپندان و طبقات چهارگانهٔ اجتماعی، آتشها، خوانسالاران و خنیاگران و دربانان و خود میزبان ذکر شدهاست. ذکر اسپهبدان چهارگانه، دلالت بر این دارد که این رساله به احتمال قوی در دورهٔ ساسانیان در زمان انوشیروان یا پس از او تألیف شدهاست. متن آن در مجموعهٔ متون پهلوی به چاپ رسیده و تاوادیا نیز بار دیگر آنرا تهذیب و به انگلیسی ترجمه کردهاست. این متن به فارسی نیز ترجمه شدهاست. [۱]
- تفضلی، احمد، و به کوشش آموزگار، ژاله. تاریخ ادبیات ایران پیش از اسلام. تهران: انتشارات سخن، ۱۳۷۶ ISBN 964-5983-14-2
|
ادبیات فارسی |
|
|
|
|
|
|
|
| فارسی دری |
|
|
|
|
سده یکم
|
|
|
|
سده دوم
|
|
|
|
سده سوم
|
|
|
|
سده چهارم
|
|
|
|
سده پنجم
|
|
|
|
سده ششم
|
|
|
|
سده هفتم
|
|
|
|
سده هشتم
|
|
|
|
سده نهم
|
|
|
|
سده دهم
|
|
|
|
سده یازدهم
|
|
|
|
سده دوازدهم
|
|
|
|
سده سیزدهم
|
|
|
|
|
|
|
سده نخست
|
|
|
|
سده دوم
|
|
|
|
سده سوم
|
|
|
|
سده چهارم
|
|
|
|
سده پنجم
|
|
|
|
سده ششم
|
|
|
|
سده هفتم
|
|
|
|
سده هشتم
|
|
|
|
سده نهم
|
|
|
|
سده دهم
|
|
|
|
سده یازدهم
|
|
|
|
سده دوازدهم
|
|
|
|
سده سیزدهم
|
|
|
|
|
|
| معاصر |
|
|
شاعران
|
|
ایران
|
|
|
|
افغانستان
|
|
|
|
تاجیکستان
|
|
|
|
ازبکستان
|
|
|
|
پاکستان
|
|
|
|
هند
|
|
|
|
آذربایجان
|
|
|
|
ارمنستان
|
|
|
|
|
رماننویسان
|
|
|
|
داستانکوتاهنویسان
|
|
|
|
نمایشنامهنویسان
|
|
|
|
فیلمنامهنویسان
|
|
|
|
سایر
|
|
|
|
|